माँ

(मेरी नज़र में अगर ब्रह्मांड का सबसे सुंदर कोई शब्द है तो वो है माँ…जब भी किसी छोटे बच्चे को देखता हूँ तो बार-बार मन में एक ही ख्याल आता है कि काश …मुझे भी मेरा बचपन एक बार पुनः मिल जाता जो कि सम्भव नही है, फिर भी…मैं अपनी माँ से इस गीत के माध्यम से मैं क्या कुछ माँगता हूँ…)

माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ,

तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ।

बचपन के वे दिन जब मैं इक छोटा-नन्हा बच्चा था,

उठने, चलने और बोलने में बिल्कुल कच्चा था,

बचपन के वे दिन फिर से दो-चार माँगता हूँ,

तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,

माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।

मेरी शरारत मेरी जिद्द पर तू अक्सर झल्लाती थी,

भैया के थाली से फिर भी खाना मुझे खिलाती थी,

बाबा-भैया-बहना का वो घर-द्वार माँगता हूँ,

तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,

माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।

गली, मोहल्ले, चौराहों पर जब-जब कंचे खेला,

वापस जब भी घर लौटा तो थप्पड़ तेरे झेला,

माँ फिर से तेरे वे थप्पड़ दो-चार माँगता हूँ,

तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,

माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।

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About the Author: दीपक ' दीप '

नाट्य लेखन, नाट्य निर्देशन, अभिनय एवं काव्य लेखन एवं काव्य-पाठ मेरी दिनचर्या में शामिल है। राष्ट्रीय स्तर की नाट्य -प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेष्ठ अभिनय एवं निर्देशन पुरस्कारों से सम्मानित। अखिल भारतीय एवं स्थानीय मंचों में काव्य-पाठ एवं मंच -संचालन। श्रेष्ठ-कवि पुरस्कार से सम्मानित। वर्ष 2017-18 के लिए 'KCN CLUB' द्वारा "कला एवं साहित्य सम्मान" मेरी माँ का सानिध्य एवं समर्थन ही मेरी सांस्कृतिक गतिविधियों को बार-बार प्रेरित करता रहा। स्कूल एवं कॉलेज के कार्यक्रमों तथा प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता रहा, आशातीत सफलता भी मिलती रही जिसके चलते आगे और बेहतर करने की इच्छा प्रबल होती रही ।

2 Comments

  1. बहुत ही सुंदर और भावुक रचना।सभी के दिल को छू जाने वाली कविता। दीपकजी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामना।

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