(मेरी नज़र में अगर ब्रह्मांड का सबसे सुंदर कोई शब्द है तो वो है माँ…जब भी किसी छोटे बच्चे को देखता हूँ तो बार-बार मन में एक ही ख्याल आता है कि काश …मुझे भी मेरा बचपन एक बार पुनः मिल जाता जो कि सम्भव नही है, फिर भी…मैं अपनी माँ से इस गीत के माध्यम से मैं क्या कुछ माँगता हूँ…)
माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ,
तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ।
बचपन के वे दिन जब मैं इक छोटा-नन्हा बच्चा था,
उठने, चलने और बोलने में बिल्कुल कच्चा था,
बचपन के वे दिन फिर से दो-चार माँगता हूँ,
तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,
माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।
मेरी शरारत मेरी जिद्द पर तू अक्सर झल्लाती थी,
भैया के थाली से फिर भी खाना मुझे खिलाती थी,
बाबा-भैया-बहना का वो घर-द्वार माँगता हूँ,
तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,
माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।
गली, मोहल्ले, चौराहों पर जब-जब कंचे खेला,
वापस जब भी घर लौटा तो थप्पड़ तेरे झेला,
माँ फिर से तेरे वे थप्पड़ दो-चार माँगता हूँ,
तेरी प्यारी-प्यारी लोरी-दुलार माँगता हूँ,
माँ तुझसे अपना बचपन उधार माँगता हूँ।

बहुत ही सुंदर और भावुक रचना।सभी के दिल को छू जाने वाली कविता। दीपकजी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामना।
धन्यवाद राजेश भाई…..